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Inculcating Gratitude

‘स्क्रीन फ्री’ बचपन

मोबाईल पर पबजी या टीवी पर शिनचैन,
वीडियो गेम्स और कार्टून चैनल्स ही अब चलते दिन-रैन,
क्यों भूल गए हैं बच्चे खुली हवा में खेलना,
टैक्नोलॉजी और बचपन का क्यों रह गया कोई मेल न।

जब मोबाईल नहीं होता था, तब क्या बच्चे होते थे बोर?
ये सुनकर मुझे याद आता है, भीड़े (पहाड़) में दौड़ते हुए बच्चों का खिलखिलाता शोर!

स्कूल से आकर, गरम-गरम दाल-भात खाकर,
बस्ते खुद खुल जाते थे, होमवर्क खत्म करके,
सब दोस्त रोज़ शाम को खुली हवा में बाहर खेलने आते थे।

कभी ‘टिप्पी-टिप्पी टॉप, विच कलर यू वॉन्ट’,
तो कभी मोज़े की बनी बॉल से सीमैन्टैन के पत्थर गिराते थे,
छुप्पन-छुपाई से लेकर गिल्ली-डन्डा तक,
क्या लड़की क्या लड़का सब साथ खेलने जाते थे।

छूने (डैन-डैन) के खेल में खूब दौड़ लगाते थे,
पौसम पा भई पौसम पा के अन्त में दो टीम बनाकर,
एक दूसरे का हाथ पकड़कर टग ऑफ़ वॉर का ज़ोर लगाते थे,
लँगड़ी टाँग और खो-खो खेलने के साथ-साथ,
काँच के हरे-काले अँठी और अँठे (कँचे) भी जीतकर लाते थे।

कार्डबोर्ड वाला लूडो भी कम फेवरेट नहीं होता था,
सस्ता ही सही पर महँगे मोबाईल और कम्प्यूटर की तरह, उसमें किसी का बचपन नहीं खोता था,
सब बड़ाते अपनी गोटियाँ बारी-बारी और,
काटते थे दूसरे की गोटियाँ ताकि हार न जाँए अपनी पारी।

साँप-सीढ़ी में एक अलग रोमाँच होता था,
स्क्रीन टाईम से दूर हमारा बचपन भरपूर होता था,
खुले आसमान की जगह आज चार दीवारों ने ले ली,
जहाँ खेल-कूद से पूरे शरीर की होती थी कसरत,
वहाँ आज सिर्फ ऊँगलियों के हिलने की पूरी होती है हसरत।

लैपटॉप और मोबाईल के बिना भी एक सँसार हुआ करता था,
गर्मी, सर्दी, या बरसात में खेलने से तब कहाँ कोई बच्चा डरता था,
छोटा-बड़ा अमीर-गरीब ये सब एक हो जाते थे,
गिर कर उठने की और मिलजुल कर रहने की कला,
बच्चे तब खेल-खेल में खुद ही सीख आते थे।

माँ की साड़ी लेकर बगीचे को सजाते थे,
अपने-अपने घरों से आलू, तेल और आटा लाकर,
माँ की मदद से बड़िया आलू-पूरी बनाते थे,
पैसे जमा करके अँकल चिप्स, एन पी च्यूईंग गम, कैम्पको चॉकलेट, पौपिन्स और फैन्टम की स्वीट सिग्रेट खरीदकर,
हम छोटे बच्चे निडर हो अकेले ही पिकनिक पर जाते थे।

वो सच्चा बचपन आज बहुत कम ही दिखता है,
अब कहाँ कैरम और लूडो, हर बच्चे के हाथ में मोबाईल दिखता है,
आज जब छोटा बच्चा मोबाईल खुद चला लेता है,
माँ-बाप फक्र महसूस करते हैं, 
बहुत स्मार्ट है हमारा बच्चा कहकर वो एक अजब दंभ भरते हैं,
नहीं समझ पाते वो इतनी सी बात, मोबाईल के कारण तो कितने नादान बचपन रोज़ मरते हैं।

मैं खुशकिस्मत हूँ मैंने अपना बचपन सच में जिया है,
बिना टैक्नोलॉजी की अल्हड़ यादों का दिल से शुक्रिया है,
उन अनमोल क्षणों की तब कोई सैल्फी नहीं ली तो क्या हुआ,
दिल के आईने ने वो नटखट बचपन हमेशा के लिए कैद कर लिया है। #IdoThankU


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Tripti Bisht

She is a dreamer from the hills, small town but big dreams .......................................................................... When surrounded amidst nature, she beams ..................................................................................................... She finds refuge in the mountains, sun, sand, and the sea ............................................................................... And counts them all as blessings, just like a Li'l Birdie on a tree.

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Comments

  • Kailash

    Beautiful………

  • Rexil

    Wow.. a fact in the form of poem.
    We really miss those days.. no worries, no stress.. nice poem Tripti.. keep it coming.

  • Mugdha

    Hello Tripti,

    What a beautiful poem and how profound! And the fact that you don’t shy away from writing in Hindi is truly refreshing and laudable! A rare gift indeed! Looking forward to many more…

    Mugdha

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